वैलेंटाइन’स डे, अम्मा, और हमारा प्यार।

फिल्म डॉन में अमिताभ बच्चन ने दो भूमिकाएँ निभायी हैं। उनमें से पहला किरदार नकारात्मक है। डॉन एक बहुत खतरनाक अपराधी है और उसके ही शब्दों में ११ मुल्कों की पुलिस उसका पीछा कर रहीं होतीं हैं। फिल्म शोले में जय और वीरू टुच्चे चोर हैं। फिल्म डर में शाहरुख़ खान ने एक बेहद संगीन और जुनूनी आशिक़ का किरदार निभाया है। फिल्म स्पेशल छब्बीस में अक्षय कुमार ने एक ठग का किरदार निभाया।

ये सब मैं आपको क्यूँ बता रहा हूँ? इस से पहले कि मैं उसका जवाब दूँ, मैं एक बात और बता देता हूँ। अभिनेता प्राण शायद अब तक के सबसे हरफनमौला कलाकार रहे हैं। कहा जाता है कि उनके नकारात्मक किरदारों को इतनी नफरत मिली कि एक वक़्त पर दर्शकों को यकीन हो गया कि प्राण निजी ज़िन्दगी में भी वही हाथ में चाबुक लेकर घूमने वाले पूंजीवादी हैवान हैं जो गरीब किसानों का खून पीता है। लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखना बंद कर दिया। Continue reading “वैलेंटाइन’स डे, अम्मा, और हमारा प्यार।”

Grapes of Wrath -‘We take a beatin’ all the time.’

I like to look at a book as though it was formed like the universe (with all the conjectures) and grew and nurtured on the world around it. However, a book is incumbent to live up to this perspective.

Grapes of Wrath is such a book. It starts from the dust bowl Oklahoma and moves to California, tracing the trajectory of becoming and unbecoming of migrants, a family seen from close quarters by the author and the graph it scales. While it is the essential storyline of the book, Grapes of Wrath has been able to capture life as it is. I can conclude the book with this imagery: concentric circles, where, in the outermost circle lies nature, in the middle is the Manself (a word coined by the author to denote man and his desires) and within their lap lie the Joads (the family). Continue reading “Grapes of Wrath -‘We take a beatin’ all the time.’”