Dear Readers of Bookstalkist

We are in the running for The Indian Blogger Award 2017 brought forth by IndiBlogger and VOW. We are running for the following categories –

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I was taking a break at my cousin’s place at Mumbai before starting for the onward journey to home. My niece was about 10 years old then. It was evening and we were talking of studies, sports, music and every other activity she was involved in. At one point, she made a comment – “Chachu, aap chaai bahut peete ho kya? Chai peene se hi aapka rang aisa ho gaya hai.” (Uncle, do you take tea often? Your color has turned into this because of this.). Her mom who was sitting in a corner, feeling embarrassed cut her short and told me – “We have told her that she would become dark if she drank tea, just to keep her away from it. Please don’t mind.”  I couldn’t say much. Here was a kid who had been taught that dark people didn’t exist in the world. People became dark only because they overdrank tea.

फिल्म डॉन में अमिताभ बच्चन ने दो भूमिकाएँ निभायी हैं। उनमें से पहला किरदार नकारात्मक है। डॉन एक बहुत खतरनाक अपराधी है और उसके ही शब्दों में ११ मुल्कों की पुलिस उसका पीछा कर रहीं होतीं हैं। फिल्म शोले में जय और वीरू टुच्चे चोर हैं। फिल्म डर में शाहरुख़ खान ने एक बेहद संगीन और जुनूनी आशिक़ का किरदार निभाया है। फिल्म स्पेशल छब्बीस में अक्षय कुमार ने एक ठग का किरदार निभाया।

ये सब मैं आपको क्यूँ बता रहा हूँ? इस से पहले कि मैं उसका जवाब दूँ, मैं एक बात और बता देता हूँ। अभिनेता प्राण शायद अब तक के सबसे हरफनमौला कलाकार रहे हैं। कहा जाता है कि उनके नकारात्मक किरदारों को इतनी नफरत मिली कि एक वक़्त पर दर्शकों को यकीन हो गया कि प्राण निजी ज़िन्दगी में भी वही हाथ में चाबुक लेकर घूमने वाले पूंजीवादी हैवान हैं जो गरीब किसानों का खून पीता है। लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखना बंद कर दिया।

15th August, 1947 – When India achieved its political freedom, it was based on relentless discharge of a value called ‘Social Responsibility’ by each and every profession of our nation. The lawyers, doctors, teachers, scientists, writers irrespective of their functional identity realized their real state of existence – the identity of an Indian citizen. Afterwards, though we understood the meaning of the functional designations, we could never understand the meaning of the word ‘Citizen’ and its associated values. 

ज़िन्दगी है, ज़िन्दगी में मुलाकातें भी होती रहतीं हैं। मुलाकातें होतीं हैं तो बातें भी चल पड़तीं हैं। हम हिन्दुस्तानी राय रखने में ऐसे भी बड़े आगे हैं। राजनीति, क्रिकेट, मज़हब, चलचित्र- आप बस मुद्दा उठाइये और चार पाँच विशेषज्ञ तो आपको राह चलते मिल जाएंगे। पान थूकते, तम्बाकू चुनाते, ताश खेलते विशेषज्ञ से शायद पाठक का भी पाला पड़ा ही होगा। तेंदुलकर को किस बॉल पर क्या मारना चाहिए, ये मेरे कॉलोनी के गार्ड से बेहतर शायद ब्रैडमैन को भी ना मालूम हो।